मैं कहां से आया हूं ? जीवन के सबसे पहले सवाल की कहानी - by Aman Singh - CollectLo

मैं कहां से आया हूं ? जीवन के सबसे पहले सवाल की कहानी

Aman Singh - CollectLo

Aman Singh

Content Writer . Hire Me

2 min read . Dec 26 2025

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एक सवाल जो अचानक मन में आ गया

एक दिन मेरे मन में एक सवाल आया:

“मैं कहाँ से आया?”

यह सवाल अचानक नहीं आया। यह किसी किताब पढ़ते हुए नहीं आया। न किसी गुरु ने पूछा। न किसी मंदिर में बैठकर।

यह सवाल एक दिन चुपचाप मेरे मन में आ गया।

मैं रोज़ की तरह अपने काम में लगा हुआ था, लेकिन अचानक मन ने जैसे खुद से पूछा—

“आख़िर ये सब है क्या?”

पहला जवाब – जो सबको पता होता है

मैंने खुद से पहला सवाल पूछा:

मैं कहाँ से आया?

मैंने खुद को जवाब दिया—

“मैं अपने माता-पिता की वजह से आया।”

यह जवाब आसान था। सबको यही पता होता है।

लेकिन मन वहीं नहीं रुका।

सवाल आगे बढ़ने लगा

अगला सवाल खुद ही उठा।

मैंने सोचा—

मेरे माता-पिता कहाँ से आए?

जवाब फिर आसान था:

  • मेरे पिता आए अपने माता-पिता से (दादा-दादी से)
  • मेरी माँ आई अपने माता-पिता से (नाना-नानी से)

अब तक सब सीधा था। सब कुछ समझ में आ रहा था।

लेकिन यहीं पर सवाल गहराने लगा

फिर एक अजीब-सा सवाल आया।

मैंने सोचा—

मेरे दादा-दादी भी तो अपने माता-पिता से आए होंगे।

मेरे नाना-नानी भी अपने माता-पिता से आए होंगे।

तो फिर…

तभी मन ने एक और सवाल खड़ा किया—

इस गाँव के बाकी लोग कहाँ से आए?

उनके भी माता-पिता होंगे। उनके भी दादा-दादी होंगे।

तो क्या यह पूरी बस्ती इसी तरह एक-दूसरे से जुड़ी हुई है?

सबसे पहला कौन था?

यहीं पर सवाल और गहरा हो गया।

अब मन ने पूछा:

सबसे पहले कौन आया?

क्या कोई ऐसा इंसान था जो सबसे पहले पैदा हुआ?

या फिर सब लोग किसी न किसी से आते ही रहे?

सीमा का एहसास

तभी एक अजीब-सी बात समझ में आई।

मुझे अपने माता-पिता का पता है। मुझे अपने दादा-दादी का भी पता है।

लेकिन—

  • उनके माता-पिता
  • उनके भी माता-पिता

उनके बारे में मुझे कुछ नहीं पता।

और इसका मतलब यह नहीं कि वे अचानक कहीं से प्रकट हो गए।

बस फर्क इतना है कि—

👉 मुझे केवल एक सीमित दूरी तक का ज्ञान है। 👉 उससे आगे की कहानी मेरी जानकारी से बाहर है।

क्या किसी को सच में पता है?

तभी सोच ने दिशा बदली।

अब मन ने पूछा:

सबसे पहले कौन आया?

मैंने बहुत सोचा। किताबों में झाँका। लोगों से पूछा। खुद से भी पूछा।

लेकिन एक अजीब-सा जवाब सामने आया—

👉 किसी को नहीं पता कि सबसे पहले कौन आया।

जो दिखता है, वही सच लगता है

जो हमें दिखता है, वह यही है—

  • लोग पैदा होते हैं
  • नए बालक-बालिकाएँ जन्म लेते हैं
  • उनसे वंश बढ़ता है
  • फिर वही लोग बूढ़े होते हैं
  • और अंत में मर जाते हैं

यही चलता रहता है।

आज भी यही हो रहा है। कल भी यही हुआ था। और शायद आगे भी यही होगा।

ऐसा लगता है जैसे यह हमेशा से चल रहा है।

एक महत्वपूर्ण समझ

कोई यह नहीं कह सकता—

“मैं सबसे पहले आया था।”

हर इंसान बस इतना जानता है—

  • मेरे पहले मेरे माता-पिता थे
  • उनके पहले उनके माता-पिता थे
  • उससे आगे… सब धुंधला है

ऐसा नहीं लगता कि उससे आगे कुछ था ही नहीं, बल्कि ऐसा लगता है कि—

👉 हमें बस उतना ही पता है, जितना हमारी याद और जानकारी पहुँचती है।

सवाल अब व्यक्ति से बड़ा हो गया

तभी मन में एक और बात उठी।

अगर यह सिलसिला यूँ ही चलता आ रहा है—

  • जन्म
  • वंश
  • मृत्यु

तो क्या यह हमेशा से चल रहा है?

यहीं खोज करते हुए एक बात समझ में आई।

इस पूरे सिलसिले को ही लोग “सृष्टि” कहते हैं।

सृष्टि क्या है?

सृष्टि यानी—

  • जीवन का आना
  • आगे बढ़ना
  • और फिर चला जाना

यह कोई एक घटना नहीं है। यह एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है।

अगला सवाल जन्म लेता है

अब सवाल और बड़ा हो गया था।

अब मन किसी एक इंसान को नहीं ढूँढ रहा था।

अब सवाल यह नहीं था—

❌ पहला आदमी कौन था

बल्कि सवाल यह था—

  • यह पूरा क्रम क्यों चल रहा है?
  • यह प्रक्रिया शुरू कैसे हुई?
  • और सबसे अहम…

क्या यह कभी रुकेगा? या जन्म-मृत्यु का यह चक्र अनंत काल तक चलता ही रहेगा?

निष्कर्ष (Conclusion)

यहीं पर मन समझ गया कि—

यह सवाल अब किसी व्यक्ति का नहीं रहा। यह सवाल हो गया था—

👉 पूरी सृष्टि का।

और यही सवाल अगली खोज की नींव बन गया।