सृष्टि क्यों बनती और नष्ट होती है? क्या यह केवल रूप परिवर्तन है ? - by Aman Singh - CollectLo

सृष्टि क्यों बनती और नष्ट होती है? क्या यह केवल रूप परिवर्तन है ?

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Aman Singh

Content Writer . Hire Me

3 min read . Dec 28 2025

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सृष्टि नष्ट होती है — यह वाक्य भ्रम क्यों पैदा करता है?

सृष्टि बनती और नष्ट होती है — यह वाक्य हम बचपन से सुनते आए हैं। लेकिन आज के समय में यह सवाल पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरी हो गया है।

क्यों?

क्योंकि आज हम चारों ओर देखते हैं—

  • धरती गर्म हो रही है
  • जंगल कट रहे हैं
  • नदियाँ सूख रही हैं
  • मौसम असंतुलित हो रहा है

और मन में डर उठता है— क्या धरती खत्म हो जाएगी? क्या सृष्टि नष्ट हो रही है?

यही डर हमें एक गहरी समझ की ओर भी ले जाता है—

👉 क्या यह सच में नाश है?  या सिर्फ़ एक रूप का अंत?

सृष्टि बनती और नष्ट होती है

सामान्य समझ में जब हम कहते हैं—

सृष्टि नष्ट होती है, तो इसका अर्थ लिया जाता है—

  • सब कुछ खत्म हो जाता है
  • धरती, सूर्य, चंद्रमा मिट जाते हैं
  • कुछ भी शेष नहीं बचता

लेकिन हिन्दू शास्त्र ऐसा नहीं कहते।

शास्त्रों के अनुसार “नष्ट होना” क्या है?

हिन्दू शास्त्रों में नष्ट होना = पूर्ण विनाश नहीं, बल्कि लय (लीन होना) है।

👉 हाँ, प्रलय में—

  • धरती
  • सूर्य
  • चंद्रमा
  • ग्रह
  • लोक

अपने वर्तमान रूप में नहीं रहते।

लेकिन ध्यान दीजिए—

❌ वे शून्य नहीं हो जाते ❌ वे कहीं गायब नहीं होते

👉 वे बीज-रूप, यानी अव्यक्त अवस्था में चले जाते हैं।

हिन्दू दर्शन की मूल अवधारणा:

व्यक्त और अव्यक्त

हिन्दू दर्शन सृष्टि को दो अवस्थाओं में समझाता है—

व्यक्त (Vyakta)

  • जो दिखाई देता है
  • जिसका नाम, रूप और आकार है
  • जो समय और स्थान में स्थित है

👉 धरती, सूर्य, चंद्रमा, ग्रह, शरीर — सब व्यक्त

अव्यक्त (Avyakta)

  • जो दिखाई नहीं देता
  • जो बीज-रूप में स्थित है
  • जो संभावनाओं की अवस्था है

👉 वही तत्व, वही शक्ति — लेकिन बिना नाम और रूप के

सृष्टि का बनना क्या है? (शास्त्रों के अनुसार)

हिन्दू शास्त्र कहते हैं—

सृष्टि का बनना = अव्यक्त का व्यक्त होना

अर्थात—

  • जो शक्ति बीज-रूप में थी
  • वही नाम और रूप लेकर प्रकट होती है

जैसे—

  • बीज से वृक्ष
  • गर्भ से शरीर

👉 कुछ नया उत्पन्न नहीं होता, जो पहले से था — वही प्रकट होता है।

सृष्टि का नष्ट होना क्या है? (शास्त्रों के अनुसार)

शास्त्रों में—

सृष्टि का नष्ट होना = व्यक्त का अव्यक्त में लीन हो जाना

अर्थात—

  • नाम चला जाता है
  • रूप चला जाता है
  • लेकिन कारण और संभावना बनी रहती है

👉 इसी को प्रलय कहा गया है।

धरती का उदाहरण: क्या धरती खत्म हो जाएगी?

धरती आज भी है। कल भी थी। और भविष्य में भी रहेगी।

लेकिन असली सवाल यह है— 👉 क्या धरती हमेशा इंसानों के रहने लायक रहेगी?

यहाँ फर्क समझना ज़रूरी है—

  • धरती एक ग्रह के रूप में नष्ट नहीं होगी
  • लेकिन धरती का मानव-अनुकूल रूप समाप्त हो सकता है

डायनासोर का उदाहरण: पहले भी ऐसा हो चुका है

लगभग 6.5 करोड़ वर्ष पहले—

  • धरती पर डायनासोर रहते थे
  • वही धरती थी
  • वही सूर्य और चंद्रमा थे

फिर—

  • जलवायु बदली
  • संतुलन टूटा
  • डायनासोर समाप्त हो गए

👉 उस समय—

  • डायनासोरों के लिए सृष्टि “नष्ट” हो गई
  • लेकिन जीवन की प्रक्रिया नहीं रुकी

तो नष्ट क्या हुआ और क्या बचा?

❌ नष्ट हुआ:

  • डायनासोरों का रूप
  • उनका समय
  • उनका संतुलन
  • डायनासोरों के अनुकूल धरती का स्वरूप

✅ बचा रहा:

  • धरती स्वयं
  • प्रकृति
  • जीवन की संभावना

👉 यही रूप परिवर्तन है, पूर्ण नाश नहीं।

आज इंसान क्या कर रहा है?

आज बदलाव—

  • प्राकृतिक कम
  • और मानव-निर्मित ज़्यादा हैं

जैसे—

  • प्रदूषण
  • ग्लोबल वॉर्मिंग
  • अंधाधुंध उपभोग

इसका अर्थ यह नहीं कि—

❌ सृष्टि गुस्से में है ❌ धरती बदला ले रही है

👉 अर्थ यह है—

संतुलन बिगड़ रहा है और जब भी संतुलन बिगड़ता है— 👉 सृष्टि अपने नियम से उसे ठीक करती है।

क्या इंसान खत्म हो सकता है?

ईमानदारी से उत्तर है—

👉 हाँ, इंसानी सभ्यता खत्म हो सकती है 👉 कई प्रजातियाँ समाप्त हो सकती हैं

लेकिन—

👉 सृष्टि नहीं रुकेगी 👉 धरती नहीं रुकेगी

बस अगला रूप आ जाएगा।

सृष्टि का मूल नियम

सृष्टि का नियम यह नहीं है कि—

सब कुछ हमेशा एक जैसा बना रहे

सृष्टि का नियम है—

  • जो संतुलन में है, वही टिकता है
  • जो संतुलन बिगाड़ता है— वह बदलता है या हट जाता है
  • वह बदलता है
  • या हट जाता है

👉 बिना क्रोध, बिना सज़ा।

शास्त्रों की पुष्टि

भगवद्गीता (2.28)

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना

अर्थ: जीव अव्यक्त से प्रकट होते हैं, बीच में व्यक्त रहते हैं, और अंत में अव्यक्त में चले जाते हैं।

👉 इसमें शोक किस बात का?

उपनिषद का उदाहरण

छांदोग्य उपनिषद कहता है—

जैसे नदियाँ समुद्र में जाकर अपना नाम–रूप छोड़ देती हैं, वैसे ही सृष्टि प्रलय में अव्यक्त में लीन हो जाती है।

क्या प्रलय में धरती, सूर्य और चंद्रमा नष्ट हो जाते हैं?

शास्त्रीय उत्तर—

👉 नहीं, वे शून्य नहीं होते 👉 वे अपने वर्तमान रूप में नहीं रहते

वे कारण-रूप (अव्यक्त) में चले जाते हैं।

विज्ञान भी यही कहता है—

  • सूर्य भी हमेशा एक-सा नहीं रहेगा
  • अरबों वर्षों बाद उसका रूप बदलेगा

👉 यह भी अचानक नाश नहीं, बल्कि धीरे-धीरे रूप परिवर्तन है।

प्रलय का अर्थ: विनाश नहीं, विश्राम

पुराणों में प्रलय को कहा गया है—

  • लय
  • विश्राम
  • संकोच

अर्थात—

  • सृष्टि का थककर रुकना
  • फिर नए रूप में प्रकट होने की तैयारी

👉 इसलिए हर प्रलय के बाद सृष्टि फिर होती है।

अंतिम निष्कर्ष

हिन्दू शास्त्रों के अनुसार—

👉 सृष्टि का नाश नहीं होता 👉 उसका केवल रूप परिवर्तन होता है

  • डायनासोर गए
  • इंसान आए
  • आगे कोई और रूप आएगा

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अगले लेख में हम समझेंगे: “सृष्टि नष्ट होने के बाद जाती कहाँ है?” प्रलय के बाद क्या बचता है?